आज ५ अगस्त २०२०, भार. श्रावण १४,भाद्रपद कृष्ण २ के शुभ और पावन दिवस पर भारत में पिछले १ सहस्त्र वर्षों की सबसे अभूतपूर्व घटना घटने जा रही है। पिछले सहस्त्र वर्षों में मर्यादापुरुषोत्तम की धरती पर उनके ही आदर्शों, मूल्यों का उपहास हुआ है। विदेशी आक्रांताओं, लुटेरों से लेकर राष्ट्र के ही जयचंद जैसे धूर्त अधर्मियों के कारण प्रथ्वीराज चैहान जैसे महान धार्मिक राजा को भी एक नीच, अधर्मी, कायर, पापी के हाथों पराजित होना पड़ा व न केवल अपने प्राणों का, अपितु संपूर्ण भारतवर्ष को भी धर्म के रक्षक का बलिदान देना पड़ा। धार्मिक राजाओं, नागरिकों द्वारा बाहरी दुष्टों के साथ-साथ देश के ही अधर्मीयों विरुद्ध संघर्ष निरंतर चलता रहा। इसी संघर्ष में भारत ने इस्लामिक लश्करों का जो आतंक देखा, वो भी निहत्थे निरीह नागरिकों, महिलाओं, बच्चों पर; उससे समूचे भारत की आत्मा हिल गई और चित्कार करने लगी। ऐसे में समय-समय पर धर्म की स्थापना के लिए इस देश ने अनेकों महारथियों को जन्म दिया, चाहे वो सुहेलदेव हों, बुक्का राय हों, महाराणा प्रताप हों, छत्रपति शिवाजी महाराज हों, रानी ताराबाई हों, अहिल्याबाई होल्कर हों, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई हों। ऐसे अनेकों उदाहरणों से हमारा इतिहास गौरव गाथा का बखान करते हुआ गर्वित हुआ जाता है। परन्तु भारत में धर्म की रक्षा के लिए जितना संघर्ष रानियों-राजाओं ने किया, उससे कहीं अधिक संघर्ष राष्ट्र के उन असंख्य अनाम नागरिकों ने किया जिन्होंने अधर्म के आगे झुकने और समर्पण करने के बजाय उसका सामना किया और भारत की धार्मिक चेतना को जिवित रखा। चाहे वो सोमनाथ के असंख्य लोगों का बलिदान हो जिसमें पुजारियों से लेकर मंदिर परिसर के सफाई कर्मचारियों और सेठों से लेकर उनके नौकरों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी, या उन वीरांगना राजपूत नारियों का जौहार हो जिससे आज भी चीत्तौरगढ़ के किलों में उनके बलिदान को याद करते हुए आत्मा झकझोर जाती है पर शीश उनके सम्मान में नतमस्तक हो जाता है। इसी प्रकार धर्म को किसी न किसी रूप में जिवित रखने में अनेकानेक लेखकों, कवियों, संगीतकारों, पंडितों से लेकर समाज के निर्धन लोगों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। जैसे कि गोस्वामी तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई, देवदत्त द्विवेदी, कबीर, तुकाराम, नामदेव, गुरु नानक देव जी, इत्यादि।

ऐसा ही एक संघर्ष अयोध्या में पिछले ४७० वर्षों से चला आ रहा है। संघर्ष की शुरुआत मंगोली आक्रांता बाबर के उस कृत्य से हुई जो कि बाहरी इस्लामिक आक्रांतों के जिहाद का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका था। निरीह नागरिकों पर अत्याचार करना, महिलाओं का बलात्कार करना, असंख्य महिलाओं व बच्चों को गुलाम बना कर ले जाना व भारत की संस्कृतिक और धार्मिक धरोहरों पर चोट करना। सोमनाथ मंदिर, नालंदा विश्वविद्यालय, कश्मीर का मार्तण्ड सूर्य मंदिर, काशी का ज्ञानव्यापी मन्दिर ऐसे ही कुछ उदाहरण हैं। कुछ अनुमानों के अनुसार इन विदेशी आक्रांताओं ने ३०,००० से लेकर ८०,००० या उससे भी अधिक मंदिरों को तबाह किया। प्रत्येक मंदिरों, विश्वविद्यालयों, मठों की रक्षा करते हुए असंख्य लोगों ने अपने प्राणों का बलिदान तो दिया ही, परंतु उससे भी अधिक लोगों की आजीविका छिन गई और समूचे समाज का अनेकानेक प्रकारों से उपहास हुआ। ऐसा ही कुछ अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर भी हुआ। बाबर ने अपनी शक्ति, नफरत, अहंकार, धूर्तता के चलते राम मंदिर को तुड़वा दिया। इतना ही नहीं, उसने मंदिर के ही ढांचे का प्रयोग कर उसी स्थान पर एक मस्जिद खड़ी कर दी। ऐसा अनेकों आक्रांताओं ने कई बार किया था और आगे भी करने वाले थे। राम मंदिर को ढहाने के बाद से ही राम भक्तों का संघर्ष निरंतर चलता रहा। इस संघर्ष का इतिहास मीनाक्षी जैन जी ने अपनी पुस्तकों में चित्रार्थ किया है। ये संघर्ष निरंतर चलता रहा। बाबर के मरने के बाद भी उसके धूर्त विचारों के समर्थक श्रीराम की जन्मभूमि पर ही उनके मंदिर का विरोध करते रहे। वैसे कई इस्लामिक जानकारों का कहना रहा है कि दुसरों की पूजास्थली को तबाह कर मस्जिद बनाना इस्लाम में हराम है। पर गज़वा ए हिंद की धुन में सवार व काफ़िरों के सर्वनाश का भाव लिए जिहादीयों के आगे कुरान के शब्दों की भी कोई कीमत नहीं थी। साल बीतता गया, सैकड़ों वर्ष निकल गए। प्रभु श्रीराम के भक्तों ने संयम नहीं खोया और प्रभु की अराधना बाबरी मस्जिद के बाहर ही करते रहे। राम भक्तों ने अधर्म के विरुध्द इस युद्ध में स्वयं अधार्मियों सा व्यावहार नहीं किया। अयोध्या में बहुसंख्यक होने पर भी राम भक्तों ने मुसलमानों को भी अयोध्या नगरी में यथोचित सम्मान दिया। हां, बीच-बीच में कुछ लोगों की उद्दंडता के चलते नगर में दंगे भी भड़के और लोगों की जानें भी गई।

परन्तु इस संघर्ष में एक महत्वपूर्ण क्षण था कारसेवकों द्वारा बाबरी मस्जिद का ढांचा ढहाया जाना। ज्ञात हो कि इस कृत्य के पूर्व में कारसेवकों पर गोलियां चलाई गई थीं और कई कार सेवकों की जानें भी गई थीं। सैकड़ों वर्षों के क्रोध, भारत के हिन्दुओं के साथ सेक्युलरिज्म के नाम पर हो रहे छल व कारसेवकों की सरकार के ही पुलिस द्वारा की गई हत्या से कारसेवकों के धैर्य का बाँध टूट गया था और उनका विश्वास भारत की न्यायपालिका, सरकार, पुलिस पर से उठ गया। इसके फलस्वरुप कारसेवकों ने कानून हाथ में लेते हुए अधर्म और अत्याचार के प्रतीक बाबरी ढांचे को केवल अपने बाहुबल और कुछ औजारों के माध्यम से ही ढहा दिया। क्या ये कार सेवक कानून को हाथ में लेने के कारण अधर्मी हो गए? ये एक जटिल प्रश्न है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि मस्जिद को गिराया जाना श्रीराम जी के आदर्शों और आचरणों के विपरित है। श्रीराम ने महारानी कैकयी के हटधर्म का और अपने पिता के वचनों का पालन किया था। भले वे वचन अधर्मी और अन्यायी थे। परन्तु, हमें यह भी याद रखना चाहिए कि श्रीराम जी के ही परम भक्त, बजरंगबलि हनुमान जी ने सोने की लंका में आग लगा दी थी। कभी-कभी अन्याय और अधर्म के विरुद्ध युद्ध में कुछ लोगों को अधर्म रूपी हलाहल भी पीना पड़ता है। कुछ ऐसा ही हलाहल कार सेवकों ने पिया। इस घटना पर बहुत हो-हल्ला मचा। उत्तर प्रदेश की सरकार गिर गई। पाकिस्तान और बांग्लादेश में असंख्य हिन्दू और जैन मंदिरों को तोड़ा गया। बॉम्बे में दाऊद इब्राहिम ने बॉम्ब ब्लास्ट करवाये और सैकड़ों लोगों की जानें ले लीं। देश में कई स्थानों पर दंगे हुए। यहां तक की १० वर्षों बाद गोधरा में दर्जनों कार सेवकों को सुनियोजित साजिश के तहत आगजनी कर जला कर मार दिया गया, जिससे गुजरात में दंगे भड़क उठे। इतना सब कुछ हुआ एक बाहरी आतंकवादि के राम मंदिर के ऊपर बनाए गए ढांचे को ढहाए जाने के कारण। सोचने वाली बात तो ये है की बाबरी ढांचे को ढहाने के दो वर्ष पूर्व ही कश्मीर में कश्मीरी पंडितों का नरसंहार हुआ था, महिलाओं का बलात्कार हुआ था, श्रीनगर में भरी बाजार में जज को गोली मारी गई थी, लाखों कश्मीरी हिन्दुओं को अपने पुरखों की धरती को छोड़कर दर-दर भटकने पर मजबूर होना पड़ा था और हाँ, कश्मीर में असंख्य मंदिरों को तोड़ा भी गया था। कम शब्दों में कहें, तो बाबर वाला कृत्य कश्मीर में दोहराया गया था। इतना बड़ा नरसंहार जिसमें १४०० से अधिक लोगों की जानें गई थीं और कश्मीर के मस्जिदों से जिहाद का नारा लगा था; इसके बाद भी न किसी अखबार ने, नेता ने, किसी संगठन ने, न ही न्यायपालिका ने इन हिन्दुओं की आवाज को वो बल दिया जितना कि एक मस्जिद के टूटने पर हाय तौबा मचाई गई और आज भी मचाई जाती है। शर्मनाक बात तो ये है कि आज तक भारत के न्यायालयों में एक भी अपराधी को कश्मीरी हिन्दुओं पर हुए अत्याचारों पर सजा सुनाना तो दूर की बात, कोई सुनवाई तक नहीं चली। इतना ही नहीं, सुप्रीम कोर्ट के एक जज ने तो यहां तक कह दिया की न्यायालय के पास इतनी पुरानी घटनाओं के लिए समय नहीं है। जब भारत की सर्वोच्च न्यायालय में सैकड़ों हत्याओं, बलात्कारों और नरसंहार के लिए सुनवाई करने का समय न रहे क्यों कि पीड़ित हिन्दू पंडित थे, ऐसे में कार सेवकों का कानून और न्यायपालिका के विरुद्ध जा कर बाबरी ढांचे को गिराना उनकी मानवीय भावनाओं के उमाड़ को दर्शाता है।

बहुतेरे मुस्लमान ऐसे थे जो श्रीराम जी के मंदिर के पक्षधर थे। और उनके प्रयत्नों के फल-स्वरुप एक समय ऐसा लगा जब दोनों पक्षों में समझौता हो बिना किसी मुक़दमे के ही मामला सुलझ जायगा। परंतु इस मामले में अड़ंगा डालने की धृष्टता वामपंथी ‘इतिहासकारों’ ने की। इनमे आर. एस. शर्मा, इरफान हबीब, रोमिला थापर, सतीश चंद्रा कुछ प्रमुख नाम हैं। इन धूर्त ‘इतिहासकारों’ ने वर्षों से जानबूझकर, निरंतर झूठ बोलकर, और साम-दाम-दंड-भेद के सारे हथकंडे अपना कर मुस्लिम पक्ष को, न्यायालय को और देश की जनता को बरगलाने का कृत्य किया और आज भी कर रहे हैं। जबकि पुरातात्विक सर्वेक्षणों से रत्ती भर का भी संदेह नहीं था कि बाबरी मस्जिद एक मंदिर को तोड़कर उसी के ऊपर बनाई गई थी। भारतीय पुरातत्व के पितामह कहे जाने वाले पद्म भूषण श्री बी. बी. लाल, पद्म श्री से सम्मानित श्री के. के. मुहम्मद और अन्य पुरातात्विक शोधकर्ताओं ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अंत में सुप्रीम कोर्ट ने भी इन्हीं पुरातात्विक सर्वेक्षणों को आधार बनाया और वामपंथी ‘इतिहासकारों’ को लताड़ भी लगाई। सुप्रीम कोर्ट ने सर्वसम्मति से फैसला राम मंदिर के पक्ष में सुनाया और सुन्नी वक्फ बोर्ड को बदले में जमीन दुसरे स्थान पर देने का आदेश दिया। इस फैसले का स्वागत सम्पूर्ण भारतवर्ष ने मिल-जुलकर किया और देश में सौहार्द बनाए रखा। और आज के दिन माननीय प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में श्रीराम मंदिर का भूमि पूजन संपन्न किया जायगा। ये एक अभूतपूर्व घटना है। एक समय था जब भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के प्रखर विरोधी थे। यहां तक कि उन्होंने भारत के राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद जी को सोमनाथ के दर्शन करने से रोकने का असफल प्रयत्न भी किया था। और एक आज का समय है जब भारत के प्रधानमंत्री संपूर्ण गौरव और स्वाभिमान के साथ भूमि पूजन में भाग लेने जाने वाले हैं। ये है धर्म की स्थापना का प्रतीक।

श्रीराम मंदिर प्रभु के लिए नहीं बनाया जा रहा है। ये हमारी मूर्खता होगी अगर हम ये कहें की राम जी के लिए हम मंदिर बना रहे हैं। राम जी तो कण-कण में वास करते हैं और केवल उनके नाम और श्राद्ध मात्र से ही पत्थर भी पानी पर तैरने लगते हैं। न ही ये मंदिर श्रीराम चंद्र जी के सर्वश्रेष्ठ भक्त हनुमानजी के लिए है। उन्होंने तो अपना सीना फाड़ कर दिखा दिया था कि उनके सीने में भी प्रभु श्रीराम और माता सीता का सदा वास रहता है। श्रीराम मंदिर वास्तव में उनके साधारण भक्तों के लिए, भारत और संपूर्ण विश्व में श्रीराम जी के आदर्शों को स्थापित करने के लिए, और वर्षों से होते आ रहे अधर्म पर धर्म के विजय को स्थापित करने के लिए है। कोई भी मंदिर उस समाज के संस्कारों और मूल्यों का प्रतीक होता है। श्रीराम मंदिर इस बात का द्योतक है कि सैकड़ों वर्षों का संघर्ष, असंख्य लोगों का बलिदान देने के बाद अंत में अधर्मी बाबर के विचारों, और झूठ और भ्रम द्वारा भारतीय संस्कृति को दूषित-समाप्त करने की लालसा लिए आनेकानेक दुष्टों को धर्म के आगे पराजित होना पड़ा। जहां आज भारत, भारतीय सभ्यता और संस्कृति अनेक विधर्मियों के निशाने पर है, ऐसे में श्रीराम मंदिर से धर्म की रक्षा और स्थापना में विश्व के समस्त धार्मिक प्राणियों को अभूतपूर्व बल मिलेगा।

और हाँ, श्रीराम नाम का जाप कर उनकी भक्ति में लीन होने का आनंद क्या होता है ये आप हनुमान जी से पूछें या शबरी जी से, तुलसीदास जी से पूछें या विभीषण जी से, भरत जी से पूछें या लक्ष्मण जी से, सुग्रीव जी से पूछें या अंगद जी से, शत्रुघ्न जी से पूछें या जामवंत जी से, वाल्मीकि जी से पूछें या कंबन जी से, जटायु जी से पूछें या अहिल्या जी से, गांधी जी से पूछें या अटल जी से, अयोध्या से पूछें या पंचवटी से, रामेश्वरम से पूछें या थाइलैंड से, लंका से पूछें या बाली से; उत्तर आपको सदा-सर्वथा एक ही मिलेगा, भले ही उस उत्तर की भाषा, उसका स्थान और स्वरुप कोई भी हो। 

जय श्रीराम