भगवान श्री कृष्ण विभिन्न रूपों, अवतारों में पूजे जाते हैं। अपने मानव शरीर धारण करने से लेकर देह त्यागने तक उन्होंने अनगिनत रूप धारण किए और अनगिनत लीलाएं की। परन्तु जिन्होंने भी महाभारत पढ़ा है, वे उनके कुंतीपुत्र अर्जुन को कुरुक्षेत्र की भूमि पर दिए गए गीता के महान उपदेश से सर्वाधिक प्रभावित होते हैं। गीता के उपदेशों में भगवान ने एक दुःखी, भयभीत, व्याकुल और अपने धर्म से विमुख हो रहे अर्जुन को उसके द्वारा पूछे गए सारे प्रश्नों के उत्तर एक मित्र की भाँति, फिर एक गुरू की भाँति और अंत में परम परमेश्वर के रूप में दी है। ऐसे महान प्रश्न-उत्तर रूपी संवाद को संजय ने सुंदरता से धृतराष्ट्र को सुनाया है। परन्तु फिर भी धृतराष्ट्र को मोह, अहंकार वश गीता का भावार्थ समझ नहीं आया। गीता एक ऐसा महान ग्रंथ है जिसे अहंकार, मोह, और विशेषकर अपनी बुद्धि, विद्या और ज्ञान का दंभ रहते नहीं समझा जा सकता।

गीता के श्लोक तो सनातन हैं परन्तु उनकी व्याख्याएं अनगिनत। सहस्त्रों वर्षों से अनेकों महान ऋषियों, विद्वानों ने गीता की व्याख्या की है जिसमें शांकरभाष्य (शंकराचार्य जी की व्याख्या) जैसे महान भाष्य आते हैं तो आजकल के बहुतेरे भ्रमित करने वाले व्याख्यान भी। बहुत से श्लोकों का गलत अर्थ बिना किसी भूमिका के बहुत प्रचालित है। आज ऐसे ही एक श्लोक का पूर्ण अर्थ देने की मैं चेष्टा करूंगा परन्तु, मेरी एक सीधी सी चेतावनी है। गीता को समझना है तो आप स्वयं शुरू से पढ़ना प्रारम्भ करें, बीच के श्लोकों से भी आपको लाभ मिलेगा परन्तु आप बिना कुरुक्षेत्र को समझे और पीछे के उपदेशों के जाने मोह, अहंकार और अज्ञानवश त्रुटिपूर्ण अर्थ भी निकाल सकते हैं।

गीता के अध्याय २ के ४७ श्लोक में श्रीभगवान् ने उनतालीसवें श्लोक में जिस समबुद्धि (समता) को सुनने के लिये अर्जुन को आज्ञा दी थी, अब आगे के श्लोक में उसकी प्राप्ति के लिय कर्म करने की आज्ञा देते हैं।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ।। २-४७ ।।

कर्तव्य – कर्म करने में ही तेरा अधिकार है, फलों में कभी नहीं। अतः तू कर्मफल का हेतु भी मत बन और तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो।

कर्म करने में तेरा अधिकार का अर्थ है कि मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है। प्रत्येक मनुष्य की अपनी क्षमतायें और सीमाएं होतीं हैं। उसके अंदर मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है। ये एक साधारण सी समझने वाली बात है। जैसे आप महिला हों, फिर भी आप पुरुष प्रधान कार्य जैसे फुटबाल खेल सकती हो। वैसे ही एक पुरुष भी सर्वथा स्वतंत्र है की वो साड़ी पहन कर बाहर घूमने निकले। आपका और केवल आपका ही आपके कर्मों पर अधिकार है। कभी-कभी आप दुसरों के वश में भी कर्म कर बैठते हो परन्तु उनपर भी अंत में आपका ही अधिकार होता है।

परन्तु फल में तेरा किंचिन्मात्र भी अधिकार नहीं है अर्थात्‌ स्वतंत्रता नहीं है। अतः फल की इच्छा न रखकर कर्तव्य – कर्म कर। अगर तू फल की इच्छा रखकर कर्म करेगा तो तू बंध जाएगा। इसपर मेरी अपनी ओर से एक बात है। डार्विन की इवोल्यूशन से ये बात तो मनुष्यों को समझ आ गई है कि फलों की इच्छा और लालसा से ही जीव-जंतुओं से लेकर वानस्पतियों का विकास हुआ है। एक भौंरा रस की इच्छा से ही सुंदर फूलों पर मंडराता है, वे फूल भी इसीलिए रंग बिरंगे और सुगंधित होते हैं क्यों कि वो भौंरों को आकर्षित कर सकें। ऐसे में जब सारा जीवन ही फलों की इच्छा से चलता है तो श्री कृष्ण अर्जुन को ये कैसा उपदेश दे रहे हैं। पे‍हली बात, श्री कृष्ण ने कहा है कि फलों पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं। ये बात सारे जीव जंतुओं पर भी लागू होता है। जैसे भौंरा कितनी ही लालसा से किसी फूल पर मंडराता हो परन्तु वहीं पर कोई पक्षी आ कर उसे खा कर चला जाता है और उस भौंरे की इच्छाओं का अंत हो जाता है। श्रीभगवान का यही उपदेश है कि फलों पर तुम्हारा संपूर्ण नियंत्रण कभी नहीं हो सकता। यहां तक मनुष्यों और पशुओं की बात बराबर की थी परन्तु, मनुष्यों में विशेषताएं हैं जो मैं आप, हम सब जानते हैं। और मनुष्य की विशेषताओं के साथ-साथ उसकी इच्छायें भी अनंत हैं। फलों की इच्छा से किया हुआ कर्म मनुष्य को और बाँधता चला जाता है। मनुष्य की कामनाओं को, मोह को, अहंकार को होम देता जाता है। ये उस मनुष्य के लिए अकल्याणकारी तो होती ही है, ये कभी-कभी संपूर्ण धरती के लिय भी खतरा बन जाता है। चाहे द्वितीय विश्व युद्ध हो, या ग्लोबल वार्मिंग; मनुष्य की अनंत इच्छाओं और फलों की लालसाओं ने ही मनुष्य को कई बार दुःख और विनाश के मुख पर धकेला है।

आपका प्रश्न अब ये होगा कि फल की इच्छा और मोह को ही त्याग दें तो कर्म करें ही क्यों? ये तो सन्यासियों वाली बात हो गई। इस पर श्रीभगवान ने कहा है कि ये अज्ञानता है की मनुष्य बिना कर्म किये रह सकता है। मनुष्य उठता-बैठता, सोता-जागता कर्म करते रहता है। बिना कर्म किए एक क्षण भी जिवित नहीं रहा जा सकता। ऐसे में मनुष्य को योगी बनना है तो निष्काम भाव से कर्म करना चाहिए। यही योग की परिभाषा है: योगः कर्मसु कौशलम्। तो यहां एक बात आती है धर्म की। मनुष्य को अपने धर्म अनुसार निष्काम भाव से कर्म करना चाहिए। (धर्म की व्याख्या करने के लिए तो एक अलग से पोस्ट लिखने की आवश्यकता है क्यों कि आज के अधिकतर लोगों को धर्म का ज्ञान ही नहीं है।)
इसी श्लोक में श्रीभगवान आगे कहते हैं कि तू कर्मफल का हेतु भी मत बन। तात्पर्य है कि शरीर, इंद्रियाँ, मन, बुद्धि आदि कर्म – सामग्री के साथ अपनी किंचिन्मात्र भी ममता नहीं रखनी चाहिए; क्योंकि इनसे ममता होने से मनुष्य कर्म – फल का हेतु बन जाता है। फलों का हेतु का अर्थ है फलों के अधीन, या मिलने वाले फलों अनुसार आपका क्रोध, मोह, अहंकार, सुख दुख और आगे के कर्म प्रभावित होंगे। आप अपने फलों के दास बन जाएंगे।

आगे श्रीभगवान कहते हैं कि कर्म न करने में भी तेरी आसक्ति नहीं होनी चाहिए। कारण कि कर्म न करने में आसक्ति होने से आलस्य, प्रमाद आदि होंगे। कर्मफल आसक्ति रहने से जैसा बंधन होता है, वैसा ही बंधन कर्म न करने में आलस्य, प्रमाद आदि होने से होता है; क्यों कि आलस्य – प्रमाद भी एक भोग होता है अर्थात्‌ उनका भी एक सुख होता है। जहां भी राग, आसक्ति होती है, वो बांधने वाली होती है।

और मैंने पहले ही कहा था, फल की इच्छा त्याग कर निष्काम भाव से कर्म करते रहें, यही श्रीभगवान का यहां अर्जुन को उपदेश है।

जय श्री कृष्ण।

उपर्युक्त श्लोक, उसके अर्थ मैं मैंने गीता प्रेस गोरखपुर के साधक – संजीवनी संकरण जिसका टीका स्वामी रामसुखदास जी द्वारा किया गया है, की सहायता ली है। मैंने अपने विवेक और क्षमताओं की सीमा में अपनी ओर से भी कुछ अर्थ देने की चेष्टा की है। त्रुटि होने पर आप कृप्या क्षमा करें ओर कमेंट में त्रुटि ठीक करने में सहयोग करें।

चित्र हर्ष मलिक द्वारा बनाई गई चित्र pixel.com से ली गई है।